फोन देखने की लत से बच्चों में रीड की हड्डी में दर्द, आंखों में जलन और मानसिक रोग समेत आने लगी है परेशानियां
हापुड़। बच्चों में मोबाइल फोन देखने की लत उन्हें बीमार कर रही है। इनमें ऑनलाइन गेम फेसबुक यूट्यूब और पढ़ाई शामिल है।
चिकित्सकों की मानें तो 10 से 14 साल तक के बच्चों में यह स्थिति ज्यादा देखने को मिल रही है। इस प्रकार के मरीजों की संख्या पिछले तीन साल में 40 फीसदी तक बढ़ गई है। चिकित्सक इसे भी कोरोना का ही एक साइड इफेक्ट मान रहे हैं।
मध्यम वर्गीय व संपन्न परिवारों के बच्चे इस श्रेणी में शामिल हैं। बच्चों व अभिभावकों बातचीत करने पर पता चला है कि कुछ अभिभावक भी बच्चों की इस लत के लिए जिम्मेदार हैं।
अक्सर महिलाएं घरेलू काम करने के लिए बच्चों के हाथ में मोबाइल थमा देती हैं। शुरुआत में बच्चा मोबाइल के साथ समय बिताता है और फिर लत का शिकार हो जाता है।
लगातार मोबाइल देखने से जहां बच्चों में भूख कम लगने की शिकायत मिल रही है। वहीं शक्ति नगर निवासी एक व्यक्ति ने बताया कि उनके सात साल के बेटे को खाना खिलाने के लिए मोबाइल का सहारा लेना पड़ता है। अगर मोबाइल नहीं दिया जाता तो वह खाना ही नहीं खाता।
मनोचिकित्सक-डॉ विकास सैनी ने बताया कि कोरोना काल के बाद से बच्चों में यह बदलाव देखने को मिले हैं। सही उपचार व काउंसलिंग के माध्यम से बच्चों की लत से छुटकारा पाया जा सकता है।
वरिष्ठ फिजिशियन-डॉ पराग शर्मा ने बताया कि मोबाइल में देर रात तक गेम देखने या अन्य वीडियो देखने के कारण बच्चों की रीढ़ की हड्डी टेडी होना, कधे व पेट में दर्द, आंखों में पानी गिरना, रात में नींद पूरी ना होना और भूख न लगने जैसी परेशानियां सामने आ रही है।
नेत्र रोग विशेषज्ञ-डॉ अतुल आनंद ने बताया कि सामान्य तौर पर आंखों का ब्लिकिंग रेट 15 से 16 पाया जाता है। लेकिन लंबे समय तक मोबाइल देखने से यह 6 से 7 के निम्न स्तर पर पहुंच रहा है। इसके अलावा 80 फीसदी बच्चों की आंखों में ड्राइनेस सामने आ रही है। कम उम्र में चश्मा लगना भी इसी का एक कारण है।