हापुड़ में गेहूं की थ्रेसिंग और धूल भरी हवाओं से लोगों का सांस फूल रहा है। जन आरोग्य मेलों से लेकर अस्पतालों की ओपीडी में ऐसे मरीजों की भरमार है। सांस उखाड़ने वाली खांसी से मरीज परेशान हैं। बच्चों पर भी अस्थमा का असर है।
सांस की समस्या वाले मरीजों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन जिले के किसी सरकारी अस्पताल में फेफड़ा रोग विशेषज्ञ नहीं है। थ्रेशिंग और गर्मी से अस्थमा के रोगियों की सांसें फूलने लगी हैं। मौसम में परिवर्तन और भूसे की धूल से वातावरण दूषित होने लगा है। तेज धूप और हवा में धूल के कारण रोगियों की संख्या में भी इजाफा हुआ है।
फिजिशियन डॉ. प्रदीप मित्तल ने बताया कि अस्थमा सांस से जुड़ी बीमारी है, इसमें मरीज को सांस लेने में तकलीफ होती है। इस बीमारी से सांस की नली में सूजन या पतलापन आ जाता है। जिससे सांस लेते समय फेफड़ों पर अधिक दबाव महसूस होता है और मरीज की सांस फूलने लगती है। इसके अलावा मरीज को खांसी होने लगती है और सीने में जकडन के साथ साथ खड़खड़ाहट की आवाज आने लगती है। ऐसे मरीजों की संख्या काफी बढ़ी है।
गर्मी में काम करने और थ्रेशिंग के समय सांस की बीमारी बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। हवा में धूल के कण होने के कारण मरीजों को सांस लेने में परेशानी होती है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. समरेंद्र राय ने बताया कि बच्चों में अस्थमा के लक्षण दिख रहे हैं। रात के समय अधिक खांसी हो रही है। दवाओं के साथ इंहेलर देने की भी जरूरत पड़ रही है। ऐसे वातावरण में बच्चों का अधिक ध्यान रखना चाहिए।